कोरोना महामारी में जहां हर व्यक्ति आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है, वहीं कोरोना का उपचार कर रहे निजी अस्पतालों में जमकर नोटों की बरसात हो रही है। इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि अगर कोई कोरोना पीड़ित निजी अस्पताल में उपचार के लिए गया तो कम से कम दस दिन उसे वहां रखा जाता है। इन दस दिनों का बिल तीन लाख रुपये बनता है। अगर व्यक्ति को वेंटिलेटर पर जाना पड़ गया तो यही बिल पांच लाख रुपये तक वसूला जा रहा है।

इसके पीछे बड़ा कारण है सरकारी अस्पताल में अव्यवस्था का आलम। गौरतलब है कि पंजाब के सभी सरकारी अस्पतालों में कोरोना का इलाज का दावा किया जा रहा है। ज्यादातर अस्पतालों में सिर्फ ऑक्सीजन की व्यवस्था है। वहीं सिर्फ मेडिकल कॉलेजों में वेंटिलेटर की सुविधा है। अस्पताल में भर्ती अगर किसी मरीज को किसी चीज की जरूरत है तो उसे खुद बाहर कर आकर मांगना पड़ता है।
उपचार के नाम पर भी चंद डॉक्टर कोरोना पीड़ितों के पास जाते हैं, उनकी जगह पर रखा निचले स्तर का स्टाफ ही अंदर मरीजों का चेकअप करता है। ऐसे में मरीजों को सरकारी अस्पतालों में भारी असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है। यही कारण है कि लोग अपने मरीजों को निजी अस्पतालों में ले जाना बेहतर समझ रहे हैं। मरीज के आते ही निजी अस्पतालों में बिल का मीटर शुरू हो जाता है

लोगों के व्यापार ठप हैं. नौकरी खतरे में है. लोन की ई एम आई फिर से चालू हो गई हैं. जमा- पूंजी और निवेश भी शून्य होते जा रहे हैं. ऐसे में लाइलाज कोरोना मरीज को हस्पताल में रखकर बेड, छिटपुट दवा, ऑक्सीजन या वेंटिलेटर देने के नाम पर अगर हस्पताल इसी तरह लाखों रुपए लूटते रहेंगे तो आम लोगों का क्या हश्र होगा?

सरकार को तत्काल निजी अस्पतालों की इस लूट पर रोकथाम लगानी चाहिए. वरना जब तक vaccine आएगी, तब तक तो यह लूट इस कदर बढ़ जाएगी कि लोग अस्पताल जाने से डरने लगेंगे.

By Desk

error: Content is protected !!