2000 में मोहन भागवत बने सरकार्यवाह
इस प्रमुख पद के लिए दो नाम विचारणीय थे. पहले थे मदन दास देवी और दूसरे मोहन भागवत. आखिरकार आपातकाल के समय झेली गई विपदाओं, इस दौरान जनजागरूकता के लिए किए गए प्रयास. हिंदुत्व की विचारधार को दी गई धार बलवती हुई और मोहन भागवत सरकार्यवाह बने. यानी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में नंबर दो की पदवी हासिल की.

आरएसएस में सरसंघचालक के बाद सरकार्यवाह का पद सबसे अहम होता है. अघोषित तौर पर सरकार्यवाह को स्वाभाविक तौर पर अगला उत्तराधिकारी माना जाता है. मोहन भागवत ने इस अवधारणा को भी सार्थक किया. 

तीन पीढ़ी पुराना है आरएसएस से नाता
भागवत के परिवार का आएसएस से तीन पीढ़ी का नाता है. उनके दादा नारायण भागवत संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार के सहपाठी हुआ करते थे. 1925 में संघ की स्थापना के बाद नारायण भागवत ने संघ का काम शुरू किया था. नारायण भागवत के बेटे मधुकर भागवत भी संघ के प्रचारक रह चुके हैं. मोहन भागवत के पिता और दादा दोनों वकील थे.

मोहन भागवत का प्रारंभिक जीवन
11 सितम्बर 1950 को महाराष्ट्र के सांगली में जन्मे मोहन भागवत ने 12वीं तक अपनी पढ़ाई चंद्रपुर से की है. इसके बाद भागवत ने अकोला के डॉ. पंजाबराव देशमुख वेटनरी कॉलेज में दाखिला ले लिया. पढ़ाई पूरी करने के बाद चंद्रपुर में ही उन्होंने एनिमल हसबेंडरी विभाग में बतौर वेटनरी ऑफिसर नौकरी शुरू कर दी.

आपातकाल के दौरान बने संघ प्रचारक
1975 में आपातकाल लगने के बाद भागवत के माता-पिता को जेल में डाल दिया गया. इसी दौरान भागवत भी संघ के प्रचारक बने. आपातकाल के दौरान वो अज्ञातवास में रहे. 1977 के बाद उन्होंने संघ में तेजी से तरक्की की. 1991 में उन्हें संघ में अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख का कार्यभार दिया गया है. वे इस पद पर 1999 तक रहे.

2000 में मोहन भागवत बने सरकार्यवाह
इस प्रमुख पद के लिए दो नाम विचारणीय थे. पहले थे मदन दास देवी और दूसरे मोहन भागवत. आखिरकार आपातकाल के समय झेली गई विपदाओं, इस दौरान जनजागरूकता के लिए किए गए प्रयास. हिंदुत्व की विचारधार को दी गई धार बलवती हुई और मोहन भागवत सरकार्यवाह बने. यानी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में नंबर दो की पदवी हासिल की.

आरएसएस में सरसंघचालक के बाद सरकार्यवाह का पद सबसे अहम होता है. अघोषित तौर पर सरकार्यवाह को स्वाभाविक तौर पर अगला उत्तराधिकारी माना जाता है. मोहन भागवत ने इस अवधारणा को भी सार्थक किया. 

2009 में बने संघ प्रमुख
लोकसभा चुनाव 2009 के दौरान 21 मार्च 2009 को अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में मोहन भागवत सरसंघचालक बनाया गया. सुदर्शन अपने सरसंघचालक के दायित्व से स्वास्थ्य कारणों के चलते मुक्त हो रहे थे. संघ प्रमुख बनते ही उन्होंने सबसे पहले बीजेपी का कायाकल्प किया. लगातार दो चुनाव हार चुकी बीजेपी के अध्यक्ष के रूप में नितिन गडकरी की ताजपोशी हुई. 2013 में संघ ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को सहमति दी जिनके नेतृत्व ने बीजेपी ने लगातार दो बार लोकसभा चुनाव में बहुमत का आंकड़ा पार किया है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh) के प्रमुख मोहन भागवत ( Mohan Bhagwat) का आज जन्मदिन है. आज वो 70 साल के हो गए. वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऐसे प्रमुख हैं, जिनके दौर में ये संगठन ना केवल मजबूत हुआ बल्कि नई तकनीक से लैस भी. इसी दौर में वो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आया.

भागवत इस उम्र में भी अनुशासन का जीवन जीते हैं. जल्दी उठते हैं. जमकर मेहनत करते हैं. यात्राएं करते हैं और सोशल मीडिया पर भी नजर रखते हैं. उनका जीवन सादा है और प्रेरणादायक भी. भागवत के बारे में कहा जाता रहा है कि वो तकनीक को लेकर काफी सेलेक्टिव हैं लेकिन संघ ने उन्हीं के कार्यकाल में इंटरनेट और सोशल मीडिया पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई.

भागवत को ऐसे संघ प्रमुख के तौर पर जाना जाता है, जिन्होंने पिछले कुछ सालों में संघ को विस्तार देने के साथ नए जमाने के लिहाज से इसे मजबूती भी दी. जानते हैं भागवत के बारे में…

  1. परिवार तीन पीढ़ियों से संघ से जुड़ा है
    मोहन मधुकर भागवत का जन्म महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में हुआ. उनका परिवार तीन पीढ़ियों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा है. पहले उनके बाबा नानासाहेब इससे जुड़े रहे. वो संघ संस्थापक केबी हेडगेवार के साथ मिलकर काम करते थे. इसके बाद उनके पिता मधुकर राव भी संघ से सक्रिय तौर पर जुड़े रहे. वो गुजरात के प्रचारक भी बने. मां मालती संघ के महिला विंग की सदस्य थीं. भागवत परिवार के बारे में कहा जाता है कि वो टकराव की बजाय लोगों का दिल जीतने में ज्यादा विश्वास रखते हैं.
  1. रोजाना शारीरिक अभ्यास करते हैं
    भागवत की उम्र भले ही 70 साल है लेकिन संघ के सूत्र बताते हैं कि वो न केवल सुपर फिट हैं बल्कि सुपर कूल भी. रोजाना शारीरिक अभ्यास जरूर करते हैं. वो संघ के राष्ट्रीय शारीरिक प्रमुख भी रह चुके हैं. उन्हें आमतौर पर नाराज होते हुए शायद ही किसी ने देखा हो. वो किसी की भी बात बहुत ध्यान से सुनते हैं और उसका जवाब देते हैं.
  2. सुबह की शुरुआत तड़के चार बजे होती है
    संघ के अन्य स्वयंसेवकों और पदाधिकारियों की ही तरह भागवत के दिन की शुरुआत तड़के चार बजे से होती है और अक्सर रात 12 बजे तक वो कार्यों और गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं. खानपान उनका एकदम सादा है. वो कम की बजाय यथोचित मात्रा में भोजन करते हैं.
  3. खूब यात्राएं करते हैं और काफी पढ़ते हैं
    उन्हें ऐसे संघ प्रमुख के रूप में जाना जाता है, जो खूब यात्राएं करता है. उन्होंने देश ही नहीं विदेशों की भी काफी यात्राएं की हैं. लेकिन इतनी यात्राओं के बीच भी वो अपने जीवन को संतुलित करना बखूबी जानते हैं. यात्राओं के दौरान वो काफी पढ़ते रहते हैं, लेकिन क्या पढ़ना है क्या नहीं-इसे लेकर भी वो सेलेक्टिव हैं.
  4. वेटनरी डॉक्टर का काम छोड़ संघ से जुड़े
    मोहन भागवत चार भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं. उनकी शुरुआती पढ़ाई चंद्रपुर में ही हुई. फिर उन्होंने नागपुर के गवर्नमेंट वेटनरी कॉलेज से वेटनरी साइंस एंड एनिमल हसबेंड्री में बीएससी की. छह महीने तक उन्होंने पशु चिकित्सक के तौर पर चंद्रपुर के ग्रामीण इलाकों में काम भी किया लेकिन फिर पूरी तरह से संघ से जुड़ गए.
  1. प्रचारक से संघ प्रमुख तक का सफर
    वो अकोला में आरएसएस के प्रचारक बने. फिर विदर्भ और बिहार में संघ के कामों को देखा. धीरे-धीरे उनका ओहदा और स्थिति दोनों मजबूत होते गए. वर्ष 2000 में वो संघ के सरकार्यवाह (महासचिव) बनाए गए. इस पद पर उन्होंने तीन टर्म पूरे किए. इसके बाद 21 मार्च 2009 में सरसंघचालक (प्रमुख) बने. उन्हें सीधा सपाट शख्स माना जाता है. आपातकाल के दिनों में वो भूमिगत होकर संघ के कामों को अंजाम देते रहे. भागवत के कुछ भाषण विवादित भी हुए.
  2. इस तरह चुने गए संघ प्रमुख
    वर्ष 2009 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में बड़े बदलाव का दौर आया. वरिष्ठ पदाधिकारी अपने दायित्व से अलग हो रहे थे. तब संघ परिवार के सामने पहली पंक्ति की नई टीम चुनने की चुनौती थी. जब मार्च 2009 में संघ परिवार के पदाधिकारी नागपुर में मिले, तो उन्हें नया सरकार्यवाह चुनना था. क्योंकि सुदर्शनजी अपने तीन टर्म पूरा कर चुके थे.

अखबारों में छपी रिपोर्ट के अनुसार चुनाव अधिकारी एमजी वैद्य जब सरकार्यवाह के चुनाव की प्रक्रिया शुरू ही करने वाले थे, तभी तत्कालीन संघ प्रमुख सुदर्शनजी ने उन्हें रोका. उन्होंने उनके हाथ से माइक्रोफोन लेते हुए कहा-उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है. वो मोहन भागवत का नाम नए सरसंघचालक के रूप में प्रस्तावित करते हैं.

भागवत कुशल वक्ता हैं लेकिन वो नपीतुली और साफ बातें करते हैं. उनके भाषणों में कोई लागलपेट नहीं होता.

  1. सबसे कम उम्र में संघ प्रमुख बने
    जब भागवत सरसंघचालक बने तो 59 साल के थे. तब वो आरएसएस के सबसे कम उम्र के संघ प्रमुख बने. संघ में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दायित्वों का स्थानांतरण की योजना बहुत सोचसमझ कर तैयार की गई थी. हालांकि हेडगेवार ने 25 साल की उम्र में संघ की स्थापना की थी.
  2. 75 साल की आयुसीमा तय की
    भागवत ने ही परिवार के पदाधिकारियों के लिए 75 साल की आयुसीमा तय की. उन्होंने अपने तरीके से परिवार को नई शक्ल दी. उसी दौरान 52 साल के नितिन गडकरी को भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया. तभी प्रवीण तोगड़िया विश्व हिंदू परिषद के प्रमुख बनाए गए.
  1. आम लोगों को जोड़ने की शुरुआत
    भागवत के प्रमुख बनने के बाद कैडर आधारित संघ परिवार की ओर आम लोगों को जोड़ना शुरू किया. उनके दरवाजे निचले स्तर पर काम करने वाले नेताओं के लिए खुल गए.

  1. खाकी नेकर की जगह पैंट
    भागवत के ही कार्यकाल के दौरान संघ के खाकी नेकर की जगह पैंट की शुरुआत की गई. संघ से जुड़ना छात्रों और दूसरे लोगों के लिए आसान हो गया. संघ परिवार ने इंटरनेट और सोशल मीडिया पर गहरी पैठ बनाई. उन्हीं के कार्यकाल में बीजेपी ने वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव जीता. केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी.

सरकारी नौकरी से संघ के प्रचारक तक 

पढ़ाई पूरी करने के बाद मोहन भागवत ने हर नौजवान की तरह अपना रुख नौकरी की तरफ किया. उन्होंने चंद्रपुर में ही एनिमल हसबेंडरी विभाग में बतौर वेटनरी ऑफिसर नौकरी शुरू कर दी. कुछ महीने भागवत चंद्रपुर में रहे. इसके बाद उनका ट्रांसफर चंद्रपुर से 90 किलोमीटर दूर चमोर्शी कर दिया गया.

1974 में भागवत अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए अकोला चले गए. आपातकाल के कुछ दिन पहले ही उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और संघ के प्रचारक बन गए. आपातकाल के दौरान भागवत के माता-पिता को जेल में डाल दिया गया. उनकी मां मालतीबाई उस समय चंद्रपुर में जनसंघ की महिला मोर्चा की अध्यक्ष हुआ करती थीं. भागवत के पास अंडरग्राउंड होने के अलावा कोई चारा नहीं था. आपातकाल के दौरान वो अज्ञातवास में रहे. आपातकाल हटने बाद उन्होंने संघ में तेजी सी तरक्की की.

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